चकिया तहसील के गरला गांव में फसलों पर कहर, शिकायतों के बावजूद प्रशासन बेअसर आपको बताते चले की
चकिया विकास खंड के ग्राम सभा गरला में इन दिनों बंदरों का झुंड ग्रामीणों के लिए किसी आपदा से कम नहीं है।
कभी खेतों में लहलहाती फसलें अब उजड़ती नजर आ रही हैं, तो कभी घरों के बाहर खेलते बच्चे और काम करते लोग बंदरों के हमलों का शिकार हो रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि ग्रामीण डर और नुकसान के बीच जीने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों के मुताबिक, बंदरों के झुंड रोजाना गांव में घुस आते हैं और खेतों में लगी सब्जियों व अनाज की फसलों को तहस-नहस कर देते हैं।
कई बार लोगों पर हमला कर उन्हें घायल भी कर चुके हैं। इससे न सिर्फ आर्थिक नुकसान हो रहा है, बल्कि ग्रामीणों में दहशत का माहौल भी बना हुआ है।
शिकायतों का ‘जंगलराज’
ग्रामीणों ने बताया कि इस समस्या को लेकर पहले भी प्रशासन को अवगत कराया गया था। 3 दिसंबर को दिए गए प्रार्थना पत्र के बाद डीएफओ तक मामला पहुंचा, लेकिन एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी न तो कोई ठोस कदम उठाया गया और न ही मौके पर प्रभावी निरीक्षण हुआ। आरोप है कि बिना जांच किए ही कागजों में मामले का निस्तारण कर दिया गया।
किसानों की टूटी कमर
खेती पर निर्भर गांव के किसानों के लिए यह संकट किसी आपदा से कम नहीं है।
मेहनत से उगाई गई फसलें जब बंदरों द्वारा बर्बाद कर दी जाती हैं, तो किसानों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाता है। कई किसानों ने बताया कि अब खेती करना भी घाटे का सौदा लगने लगा है।
प्रशासन से आखिरी उम्मीद
ग्रामीणों ने एक बार फिर जिलाधिकारी से गुहार लगाई है कि वन विभाग को निर्देशित कर बंदरों को पकड़वाने और गांव को इस समस्या से राहत दिलाने के लिए तत्काल कार्रवाई की जाए।
चेतावनी की आहट
ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द ही समाधान नहीं निकला, तो वे सड़क पर उतरकर आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
👉 सवाल यही है—जब शिकायतें समय पर पहुंच रही हैं, तो समाधान क्यों नहीं?
गरला गांव आज जवाब मांग रहा है…क्या प्रशासन सुनेगा?
जिला संवाददाता सुरेंद्र सिंह नागवंशी।