ब्यूरो रिपोर्ट : अनुराग तिवारी
सीतापुर। जिला पशु चिकित्सालय की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों और स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार अस्पताल में कई बार पशुपालकों को सरकारी स्टॉक के बजाय बाहर से दवाएं खरीदने की सलाह दी जाती है। वहीं अस्पताल में आधुनिक जांच एवं उपचार उपकरणों की कमी होने की भी बात सामने आ रही है। इन दावों पर अस्पताल प्रशासन की ओर से समाचार लिखे जाने तक कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
जानकारी के अनुसार पशुओं के उपचार के लिए आवश्यक कई मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। कृत्रिम गर्भाधान और नस्ल सुधार कार्यक्रमों में अपेक्षित कॉन्सेप्शन रेट नहीं मिलने की भी चर्चा है। यदि ऐसा है तो इसका सीधा असर पशुपालकों की आय, दुग्ध उत्पादन और डेयरी व्यवसाय की उत्पादकता पर पड़ सकता है।
स्थिति का एक दूसरा गंभीर पक्ष शहर में बड़ी संख्या में छुट्टा और बेसहारा पशुओं का खुलेआम घूमना भी है। सवाल यह उठता है कि जब पशुपालकों को समय पर गुणवत्तापूर्ण पशु चिकित्सा सेवाएं, उपचार और नस्ल सुधार की सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं, तो पशुपालन और डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के सरकारी दावों को कैसे धरातल पर उतारा जाएगा। छुट्टा पशुओं की बढ़ती संख्या भी पशुपालन व्यवस्था की चुनौतियों की ओर संकेत करती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जिला पशु चिकित्सालय में उपचार व्यवस्था, दवा उपलब्धता, आधुनिक उपकरणों और नस्ल सुधार कार्यक्रमों की प्रभावी निगरानी की जाए तो न केवल पशुपालकों को राहत मिलेगी बल्कि डेयरी उद्योग को भी मजबूती मिलेगी।
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