आदर्श श्रीवास्तव ICONIC INDIA NEWS
गाज़ीपुर (उत्तर प्रदेश) की सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं शिक्षिका बीना राय पिछले 21 वर्षों से अंग्रेज़ी विषय की शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं। उनका जन्म 27 सितंबर 1981 को कोलकाता (पश्चिम बंगाल) में हुआ। अध्ययन, अध्यापन और साहित्य सृजन उनकी प्रमुख अभिरुचियाँ हैं। उनका उद्देश्य साहित्य के माध्यम से मानवता की सेवा करना है।
उनकी प्रकाशित पुस्तकों में ‘खुशनसीब हो गए’, ‘अंगारे गीले राख से’, ‘रब से होती हैं बातें बहुत’ तथा अंग्रेज़ी उपन्यास ‘The Man in the Diary’ प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त उनकी रचनाएँ 37 साझा संकलनों तथा अनेक राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।
बीना राय गाज़ीपुर महिला काव्य मंच की पूर्व अध्यक्षा, काशी काव्य संगम मंच वाराणसी की पूर्व उपाध्यक्ष तथा सृजनात्मिका राष्ट्रीय महिला काव्य मंच की पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रह चुकी हैं। उन्हें अखिल भारतीय अनुबंध साहित्यिक पुरस्कार, शांतिदूत साहित्य सम्मान-2021, साहित्य मनीषी सम्मान-2021, नारी शक्ति सम्मान-2023, नव उदित साहित्य सम्मान (भोपाल)-2023, काशी कजरी रत्न-2023, National Icon Author of the Year-2024 (लखनऊ), जयपुर मीराबाई साहित्यिक सम्मान-2025 तथा Awaaz The Art Centre Open Mic (नोएडा, मई-2026) में Showstopper सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है।
रचना – 1
ग़म से रौशन हुए हम तिरे प्यार में
बारहा गिरे, बारहा उठे
फिर बारहा झुके हम तिरे प्यार में।
तुमपे मर गये, मर-मर कर जिए,
मर भी ना सके हम तिरे प्यार में।
रब से तेरे दरस की दुआ हम मांगते रहे,
हम चाँद को निहार हर शब जागते रहे।
तिश्नगी मिरी क्यों मिट ना सकी,
क्यों तड़पते रहे हम तिरे प्यार में,
मर भी ना सके हम तिरे प्यार में।
तन्हाइयों के शोर में हम पागल हुए,
कोई मरहम मिला ना जब घायल हुए।
खुद से रूठकर, खुद भागते हुए,
खुद ही में छुपे हम तिरे प्यार में,
मर भी ना सके हम तिरे प्यार में।
अब तो आलम ये सारा ही झूठा लगे,
मुझको ग़म ही मेरा सिर्फ सच्चा लगे।
ग़म रहनुमा, अब ग़म ही खुदा,
ग़म से रौशन हुए हम तिरे प्यार में,
मर भी ना सके हम तिरे प्यार में।
— बीना राय
—
रचना – 2
अपने भारत को क्या हो गया
अब क्या कहा जाए कि
इस वक्त को क्या हो गया।
तार-तार हो रही नारी,
इंसानियत को क्या हो गया।
हर दिन हर पल ये हाहाकार,
मानो घड़ी प्रलय की आई है।
फिर भी क्षणभंगुर जीवन से
सबने कितनी आस लगाई है।
कुछ मुक्त नहीं मिलावट से,
अब असलियत को क्या हो गया।
हर बार चुनावी मौसम में
वादा करते हैं खोखला।
सहारा सच का कोई न ले,
हर तरफ है सिर्फ ढकोसला।
कर रहे घिनौनी राजनीति,
उनकी फितरत को क्या हो गया।
जो निर्दोष नारी को नंगी कर
कुत्तों से जूझ पड़े थे,
शायद था न उसमें एक पुरुष,
दानव से बदतर हो गए थे।
क्यों लगे विवेक में कीड़े,
उस ख़लक़त को क्या हो गया।
जला कर बस्तियाँ निर्दोषों की,
कुछ तुच्छ अधिकार मांग रहे हैं।
क्यों शर्म नहीं आती उन्हें,
हैवानियत की सीमा लांघ रहे हैं।
लग गई नज़र ये किसकी,
अपने भारत को क्या हो गया।
(ख़लक़त = भीड़)
— बीना राय
—
रचना – 3
क्या मैं लिख पाऊंगी
(छंदमुक्त कविता)
कभी-कभी मैं अपनी ही किसी तस्वीर को
दिल से चूम लेती हूँ।
देती रहती हूँ दुआ अक्सर
अपने खूबसूरत ख़्वाबों से भरी
इन आँखों को,
जिन्होंने कभी निराश होकर
हौसलों का साथ नहीं छोड़ा।
अदा करती रहती हूँ शुक्राना
अपने मेहरबान रब का,
जिसने मेरे वजूद की झोली
अपनी रहमतों से भर दी।
निहारती हूँ उन पदचिह्नों को
जो मेरे दुःख में
निस्वार्थ भाव से साथ चलते रहे।
संकल्प लेती हूँ कि
मैं भी किसी तन्हा और परेशान व्यक्ति के
दुःख में उसका सहारा बनूँ।
मैं चाहती हूँ कि
अपने हिस्से की जिंदगी
जिंदादिली से जीते हुए
कुछ भीगी आँखों की गर्म नमी पोंछ सकूँ,
और अपने चाहने वालों के दिलों में
अपना अस्तित्व बनाए रख सकूँ।
सींचती रहती हूँ
अपनी तमाम हसरतों की क्यारियों को,
ताकि कठिनाइयों के पहाड़ में भी
साहस, उम्मीद और समृद्धि के फूल खिल सकें।
फिर खुद से पूछती हूँ—
क्या मैं लिख पाऊँगी
स्वयं पर बीती
एक ऐसी किताब,
जिसे पढ़कर
मेरे जाने के बाद भी
लोगों की आँखें नम हो जाएँ?
— बीना राय
Author Profile
Latest entries
BreakingSeptember 11, 2026खेत में लगे सोलर वाटर पंप से सोलर पैनल चोरी, किसान में रोष
BreakingSeptember 10, 2026लामार्ट्स बॉयज स्कूल के हिंदी शिक्षक पर POCSO एक्ट में मुकदमा, कक्षा 9 के छात्र से कथित अश्लील चैट का आरोप!
BreakingSeptember 6, 2026बाबा कीनाराम मठ में 10 से 12 सितंबर तक होगा 427वां जन्मोत्सव, सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रहेगी धूम
BreakingSeptember 6, 2026वन विभाग और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में ट्रेलर पकड़ा गया, चालक व आरोपी मौके से फरार